Friday, September 25, 2015

"पहाड़"



वे अपने घरों की बाखलियों से एक टक
पहाड़ों के उस पार दूर से देखा करते थे शहरों को
रात के अन्यारे में वाहनों की हैड लाइट
और आकाश के तारों के मध्य कहीं चमकते थे उनके स्वप्न।

पुरखों द्वारा बनाये मंदिरों में दिन रात का मंत्रोचारण था
उनके हाथ "नमस्कार" में व सिर श्रद्धा में झुके रहते थे..
वहां आस-पास एक विचित्र शान्ति भरी थी
हर ओर से देवदारों की निगरानी में
उनके निवास सुरक्षित थे,
उनके दरवाज़ों ने ताले नहीं देखे थे...

उनके मनीऑडरों में भी हालाँकि कभी तीन रकमें नहीं देखी गयीं
फिर भी जुन्याई(चांदनी) रातों में
उनकी मुरली की धुनें दूसरे गावों तक सुनाई पड़ती..

करीबियों के चेहरे राशनकार्डों पर लगभग धुँधले पड़ चुके थे
परन्तु उनके घरों में दीप सदा प्रज्वलित रहे...
टेलीग्रामों पर उतरे शब्दों की स्याही अक्सर फैली होती
पर फिर उन्होंने खेतों में उम्मीदें गोढ़ी थीं..

जबकि उनके वहां आगंतुकों का आना एक गंभीर बात थी,
उनके चूल्हों ने अस्वीकार में कभी खांसी नहीं की...

उनके पटांगणों में एक ओखल थी, एक घास का लुट,
कुछ टूटे खिलौने, चार लकड़ियाँ, फुकनी,
एक लदी मातृ देह और दो घुटनों पे सरकती हसरतें ..

उनके मासूम पदचिन्ह
अब भी अमिट हैं वहां की पगडंडियों पर...
हिमाला जिन्हें वे गिना करते थे अक्सर खेलों में
जबकि उनके माथे पर दिखने लगी हैं लकीरें,
हैं, खड़े हैं, झुके नहीं हैं तलक दिन..

गाय बकरियों भेड़ों के श्वासों के साथ-साथ
उनके स्वर गूंजते हैं ढलानों पर आज भी,
जुगनू जिनके पीछे वे भागा करते थे
आज उनकी आँखों में नज़र आते हैं...

वे कद काठी से कमज़ोर हैं और दिखने में सामान्य
परन्तु आज भी साक्षात्कारों में उनके परिचय हैं
"पहाड़" !

"आलां"


"इस बार की छुट्टी बहुत भारी लगी, वक़्त की रफ़्तार प्लेन में बैठ कर पता नहीं चलती, वक़्त को आगे पीछे रिवाइंड करने से पता चलता है कितना कुछ कितने थोड़े से वक़्त में बाकी रह जाता है" आरिफ मियां एक सुस्त जहाज़ में बैठे अपने खालीपन को विहस्की के घूँट साथ टटोल रहे हैं.... ये खालीपन यूँ ही नहीं आता, जो हमेशा से ही अकेला हो वो कभी अकेला नहीं होता, अकेलापन महसूस करने के लिए पहले पूरी इंटेंसिटी से किसी के साथ को जिया जाना ज़रूरी है.. देयर इज़ ए ह्यूज डिफरेंस बिटवीन बीइंग अलोन एंड लेफ्ट लोनली।

खालीपन असल में कभी खाली नहीं होता वह एक मर्तबान होता है, महकती यादों से भरा हुआ, किसी के साथ बिताये कुछ ज़िंदा पलों को कभी आपने बड़े चाव से चखा होता है व जिनकी लजीज़ी आपके स्वाद में अब भी बरक़रार होती है और जिस लज़्ज़त को आप अब उसकी महक से महसूस करते हैं... बिछड़ने को डार्क रोमांस का नाम दिया गया है, प्रेम के उस पल में जहाँ आप बहुत दूर हैं फिर भी आधे आधे एक दूसरे पास छूटे हुए हैं... प्रेम वाकई एक नैसर्गिक चीज़ है, एक कोमल पंख जिसे सहेज के हम अपनी सबसे पसंदीदा किताब के बीच महफूज़ कर लेते हैं, एक खाली एनवलप जो कुछ कच्ची पक्की इबारतें रख भर देने से से अपना अस्तित्व प्राप्त करता है या फिर पुरानी "तस्वीरें" जिन पर उन पलों के तमाम रंग कैद होते हैं और जो गर्द हटाते ही फिर से एक एक करके हमारी नज़रों के सामने एक मोशन की तरह चलने लगते हैं.. खैर आरिफ मियां अपना एक बहुत बड़ा हिस्सा आलां को सौंप आये हैं... इस बार की यात्रा में एक बेचैनी है... पहली बार वापसी खटकती हुई महसूस हो रही है और उनकी नज़र रह रह के तस्वीर से झांकती आलां पर जा कर ठहरती है... आलां बला की खूबसूरत है.. आलां की सबसे ख़ास बात ये है कि वो स्त्री है, एक पूर्ण स्त्री। स्त्रीत्व को केवल चरम से ही परिभाषित किया जा सकता है... एक स्त्री तमाम भावों को अपने अंदर एक ग्लेशियर की तरह जमाये रखती है.. जब तक कि किसी सुखद स्पर्श का ताप दिल को न छुए व वे सभी भाव उस जादुई लम्स से धीरे धीरे रिसने न लगें।
और अक्सर वह आंच हम तक पहुँचती है, आरिफ मियां की हथेलियाँ नरम हैं वे एक पल में ही आलां के हृदय पर की बरसों पुरानी ठिठुरन को एक विचित्र ऊष्मा से भर देती हैं और आलां एक दो मुलाक़ातों में ही पिघलने लगती है.. एक अरसे से थकी हुई वह देह टूट कर आरिफ मियां की बाहों में इस तरह गिर जाना चाहती है जैसे वे कोई सदियों पुराना भरोसेमंद दरख़्त हो और जिसके तले अल्लाहताला ने आलां के सुकून की सेज बिछाई हो...लेकिन इस जुड़ाव की ख़ास बात सीमायें हैं.. दोनों सतर्कता से अपनी अपनी रेखाओं को संभाले हुए हैं.. इन्होने प्रेम की सूक्ष्मता को समझा व अपने अपने दयारों में रह कर इसे रजामंद किया।

और इस तरह यह दो तरफ़ा कहानी है, आरिफ मियां भी आलां के प्रभाव में कुछ इस ही तरह कैद हैं कि अब उनके कैमरे को कोई और सूरत राज़ नहीं आती, आलां की चक्की से पैदा होती वो रगड़ उसके दिल की कसमसाहट बन गयी है, आलां के बुक को होंठों से छूते ही वह प्यास अब जीवन भर के लिए तृप्त हो गयी और वे बड़ी बड़ी आँखें जिन्हें वे तस्वीरों पर छुए जा रहे हैं जैसे दो चिराग हों जिनसे उनकी राहें जगमगाने लगी हैं.. सब कुछ अपने आप सुलझ गया है.. मानो वह लम्बी तलाश एक पल में ही पूरी हो गयी हो और आरिफ की रूह अपने मकाम पर खड़ी मुस्कुराने लगी हो... लेकिन कुछ चीज़ें समझते देर हो जाती है, नज़दीकियां कितनी हो चुकी अक्सर फासलों से समझी जाती हैं...
छुट्टियां अब पूरी हो चुकीं। आज आरिफ मियां को निकलना है.. वे आलां के आँगन में खड़े उससे रुखसत अर्ज़ कर रहे हैं... आलां उफान पर है... वह कुछ इस तरह आरिफ मियां को देख रही है जैसे कितना कुछ बकाया है जो उन्हें उसे अदा करना है, जैसे वह अपना हक़ जानना चाहती है और फिर अचानक वह सैलाब जो उसने पहले दिन से अपने सीने में दबा के रखा है यकायक ही उसकी आँखों से फूट पड़ता है.. वह सफ़ेद कुरता जो आरिफ मियां आज पहने बैठे हैं वह आलां ने सिया था... आलां एक स्त्री है, पूर्ण स्त्री वह अपने चरम पर बहती हुई नदी है.. वह कई कई हाथों की अकेली कारीगर है, उसने खुद को सौंप कर प्रेम को चुना है...
आरिफ मियां खिड़की से बाहर झाँक कर एक लम्बी आह भरते हैं और आँखें मूँद लेते हैं...

Friday, September 18, 2015

आजकल झड़ी लगी रहती है..
दिन में, रात में, सोते में, जगने में।
घर में, बाहर, यात्रा और चिंतन में भी।
हृदय में, मस्तिष्क में, स्वप्नों में,
उन्माद या धैर्य 
कह दिए गए शब्दों में व अबोले जो कुछ रह गए उनमें-
घोषणाओं या फिर मौन अवस्था में।

माचिस को घिसो तो ईंधन छूट पड़ता है,
व चूल्हों के मुख पर गालों तक आंसू।

आषाढ़ के इन दिनों क्षितिज तलक भीगा है,
गीला सूर्य रंग छोड़ता है।

हर छत से बूँदें रिसती हैं,
जांगों तक पानी का घेरा।

आजकल ज़्यादा वक़्त अक्सर खोल में ही बीतता है
कुछ एक सामान सुरक्षित,
-रेनकोट की जेब में प्लास्टिक से लिपटी
"उम्मीद"
और
-एक छतरी के नीचे तुलसी का पौंधा।

मैं तुम्हें सोचता हूँ और सफ़ेद हो जाता हूँ,
जैसे किसी देवदार पे बैठी
सफ़ेद चिड़िया एकटक आकाश ताकती रही
और अब इत्मीनान से एक धवल उड़ान भरती है।
जैसे किसी मादक देह की महक से
दूर तक खिल रही हों वादियां,
या किसी बीचों-बीच पत्थर पर
वे श्वेत वस्त्र पवित्र कर देते हों तमाम झरने।
सुनो मैं दूर निकल आया हूँ, बहुत दूर...
यहाँ इस सफ़ेद झील के किनारे
एक दूधिया वृक्ष के ठीक ऊपर
कुछ उजले तारों के छींटे पड़ें हैं,
वहां उस तरफ झील में एक सफ़ेद नाव पर दो प्रेमी बैठे हैं,
कुछ स्वर फूट रहे हैं, कुछ धुनें बह रही है
वो खिलखिलाहट, वो सफेदी चांदनी में घुल रही है
और चाँद अब सफ़ेद हो रहा है..
मैंने अक्सर महसूस किया है कि यदि
प्रेम में साफगोई हो तो वह सफ़ेद हो जाता है।
और देखो
अब एक सफ़ेद साफ़ हवा मुझे घेरे हुए है
जैसे कोई बेदाग़ सी चादर मुझ पे लपेटे हुए है।
ये मीठी बूंदों की रात रानी मेरी देह पर झर रही है,
मेरे होंठों के सेकों से धौलाधार पिघल रहे हैं।
धीरे-धीरे सभी घाव भर रहे हैं
एक नींद बन आई है।
अनंत निर्वात पर चौंधियाता सफेद भर गया है,
हर तरफ से यहाँ अब धुंध घिर आई है
गाढ़ी सफ़ेद...
आह!
"शांति" अगर कहीं प्रत्यक्ष रूप से देखी गयी होगी
तो वह किसी कोमल सीप में रखा उज्जवल मोती रहा होगा,
जिसे कुछ कहना नहीं होता बस उस गर्भ में रहना होता है।
प्रेमी एक असली बैरागी होता है,
प्रेमिका एक माँ जिसे उसकी प्रगाढ़ता में उसे पढ़ना होता है।
और सुकून.....
यह एक सूखा हुआ पत्ता है
जिसे वृक्ष से झर कर उसके कमलों में रहना है।
यह एक झरा हुआ पंख है
जो आकाश से उतरा है और मेरी हथेली पे ठहरा है।
सुनो मैं दूर निकल आया हूँ, बहुत दूर..
यहाँ हर तरफ प्रार्थनाएं हैं
और शब्दों ने अपने हिस्से का प्रकाश खोज लिया है,
यहाँ दूर तक उजाला फैला हुआ है.
सफ़ेद...
यहाँ एक श्वेत वस्त्रधारी ब्राह्मणी गुलबहार चुन रही है,
और उस देवदार पर वो सफ़ेद चिड़िया आकाश ताक रही है..
सुनो मैंने महसूस किया है कि
सफ़ेद इन्द्रधनुष का एक ज़रूरी रंग होगा।

Friday, September 11, 2015

वाया "फेसबुक"-२

मैं चुपचाप सुन रहा हूँ कुछ भी कहो तो इतना हल्के से कहना कि तुम्हारे कहने की आवाज़ तो आए पर मेरे सुनने में कोई अवरोध न पैदा हो, तुम्हारे शब्दों में कहने का सुकून बचा रहे व मेरे अन्तर में सुनने की शान्ति।
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मेरे लिए सही या गलत की परिभाषा इतनी भर है कि मुझे तमाम "नीतियों" व "वादों" के बावजूद भी प्रेम हुआ करता है, मेरी व्यवस्था इतनी भर है कि मैंने अपनी खिड़की पर कागज़ की एक विंडमिल टांगी हुई है जो कि क्षीण है पर हवा के चलने पर अब तलक घूम रही है और ये कि मेरी पुतलियों में अब भी स्वप्न नाचा करते हैं.. तुम्हें चुनने के प्रति मेरा चुनाव इतना भर है कि "तमाम ग्रेशेड्स के बावजूद भी जीवन में एक हरा और एक लाल भी है जो मूड बदलते रहने पर तुम्हारी आँखों का रंग है.. मेरा डिसिप्लिन केवल इस तथ्य पर आधरित है कि तुम्हें सोचते रहने को पोषित करने हेतु जीवित रहना आवश्यक है और जीवित रहने के लिए तुम्हारा वहां सोच के उस पार अवेलेबल रहना!
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वहां उस दिन अत्यधिक बर्फ़बारी हुई बावजूद उसके मैंने किवाड़ आधे खुले रखे.. और दस्तक होते ही उम्मीद हैवी कार्डिगन, ओवर कोट व स्नो कैप की की गयी जबकि उम्मीद ने एक फटी कमीज और बिखरे बालों में दस्तक दी। 
"क्योंकि जीवन अक्सर कहा गया है कि एक अनुशासनहीन बच्चे की तरह है जिसके लक्षण अव्यवस्थित व बेतरतीब हैं खैर उस बच्चे को अब सीख तो नहीं दी जा सकती लेकिन सचेत रहते हुए उसकी किर्याओं को ग्रहण कर लेना एक पीस ऑफ़ आर्ट्स को बिना समीक्षा/ आलोचना के अपना लेना है"

इसलिए फिर एक दूसरे दिन यूँ ही जब सड़क पे चलते-चलते मुझे १०, १० के चार नोट पड़े मिले उस दिन के बाद से फिर मैंने अपनी माँ की बात मान नीचे देख के चलना शुरू कर दिया। हालाँकि वही घटना एक तीसरे दिन फिर से घटी पर इस बार मेरी चेतना में नीचे झुक के चलना तो था लेकिन नोट का मिलना नहीं था...
.... आप कह सकते हैं कि जीवन न केवल रैंडम है बल्कि एब्सट्रैक्ट भी कमतर नहीं।
यूँ तो मैंने अपनी प्ले लिस्ट को हमेशा ही "रैंडम्ली सिलेक्टेड" मॉड पर रखा, फिर भी क्षण-क्षण में अपने सबसे पसंदीदा गीत को सुनने की इच्छा पाली। और जीवन ने भी हर दफा मेरी इच्छा के विपरीत गीत बजाने शुरू किये। मेरे सबसे दुखी दिनों में उस लम्बी प्ले लिस्ट में से कोई सैड सांग नहीं बजा बल्कि थिरकने वाले हलके फुल्के गीत प्ले हुए..
… जीवन के प्रति आपके तमाम आरोपों मसलन जटिलता, अवसाद, अघुलनशीलता व संकरता के बावजूद कुसामयिक दिनों में यह स्ट्रेस बस्टर भी हो सकता है।

कोई हैरत नहीं होनी चाहिए परन्तु होती है जबकि हम हर वक़्त चेतना पे ज़ोर दिए रहते हैं दुनिया की सबसे विचित्र चीज़ें अवचेतन की अवस्था में घटती हैं। दरअसल हम चमत्कारों को घटते हुए देखने के इच्छुक हैं। हम लिखने से पहले ही चाहते हैं कुछ ऐसा लिख देना जो कालजयी हो। हम हावी रहना चाहते हैं इसलिए जादू देखते हुए भर्मित होने को भी पूरा जीने से अधिक उस क्रिया को सीख कर भर्मित कर देना चाहते हैं।
जबकि जीवन एक सरल "घटना" है इतनी सामान्य कि वह रैंडम, एब्सट्रैक्ट और चिंता का विषय भी केवल इसलिए है क्योंकि पूरी तरह हावी होने के लिए हमारा संदर्श उसके प्रति ठीक वैसा है...!


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आदमी परतों में जीता है जीता चला जाता है, आदमी दूसरे को सिरे तक समझता है ऐसा कहता है..!
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मूर्तियां जब खंडित होती हैं उन्हें मंदिरों से हटा दिया जाता है, इंसान जब खंडित होते हैं कविता में जगह बनाते हैं...
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कभी तटों पे हो तो हवा को महसूस करना, उसमे स्वीकारोक्ति होती है.. लहरों का मन पढ़ सको तो देखना स्थिर मन में भी उथलपुथल तो होती ही है.. प्रेम कभी मत करना यह प्रयोजन नहीं है.. कभी बारिश के पहले बादलों को देखना तो जानना कहना बरसने से कमतर नहीं...!

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मैं ताउम्र सामान्य तरह से एक असामान्य जीवन की कल्पना करता रहा किंतु मेरे प्रति जीवन का कोण असामान्य व दृश्य अतिसामान्य प्रस्तुत हुए। मैं जिस भी वस्तु से जुड़ा उसमें सदा साम्य ढूंढता रहा किंतु उस जुड़ाव का निष्कर्ष पूरक निकला।

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“कहाँ किस घाटी के किस शिर पर वो मंदिर है जहाँ की घंटी की गूंज में साँसे आराम पाती हैं..”

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केवल एक बच्चा ही कवि हो सकता है.. दुनिया के साथ जो चल रहे हैं वो बड़े हो रहे हैं.. बच्चों की अपनी दुनिया है.. उस दुनिया के रंग विशिष्ट हैं..

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वह ज़िद करती, ज़िन्दगी जीने की पुर ख़्वाहिश में सिगरेट की जड़ों से साँसें चुरा लेती और धुँए में अपने बोलों के शहद उतार देती। 
उसकी आवाज़ की खरांश में लर्ज़िशों की मौजें उठती, वह लहरों की आगोश में घुल गयी नदी हो जैसे, वह बड़े से चाँद के ठीक नीचे उतने ही व्यास में सुरों की लड़ियों में पिरोई हुई एक सीप। 
वह गीली रेतों में नंगे पैर चलती और अकसर कभी जब समंदर में उतरती तो मन में एक टीस उठती, वह दूर क्षितिज पर उड़ता हुआ पंछी, अभी सुथरी, अभी धुंधली, और अब ओझल... 
......वह एक छोटा सा लम्हा और लम्बी सिसकी।

खैर वाकिफ था कभी होना और यूँ भी वह हवा की झूम से झरा एक पंख,
.....मेरी यादों के सात रंग.. !


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दुनिया की तमाम लड़कियां लाल रंग में अच्छी लगती हैं, "लाल" स्मृतियों में ठहर जाने वाला सबसे गहरा रंग है.. !"

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आग अत्यंत आवश्यक होती है, भीतर की आग को रिस्टोर रखना उचित है, बात बात पे सुलग जाने वाले कहीं बीच में ही ठंडे पड़ जाते हैं.

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किसी अपनी दिशा को परिंदे उड़ते हैं.. समंदर से हो सिर्फ शहर नहीं होते, उफ़क़ भी होता है औ तहरीरें होती हैं, नमी सिर्फ मौसमों में नहीं होती, लफ़्ज़ों की पैठ से भी भंवर उठते हैं, फिसलन सिर्फ रेतों भर ही नहीं है, ज़हन भरे हों तो ज़बानें भी सरकती हैं..

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एक अंतिम गिरह खुलने तक जीवन जिज्ञासा की पीक पर छोड़ दिए गए कई अधूरे दृश्यों का एक प्लैन्ड क्लस्टर है... !

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इंतज़ार में बने रहना कितना सुखद है कि हम अब तक सफर में बने हुए हैं... किसी हसरत में बंधे हुए उसके मुकम्मल होने की कल्पना करनी है, किसी स्वप्न के बुलबुले में उतर कर हल्के से ओस पे जा बैठना है और किसी जाते हुए के हिलते हाथों को दूर तक देखते रहना कि उम्मीद बाकी है अभी उसे गुज़र कर फिर हम ही तक पहुंचना है... असल सुकून तो राह पर ही है, मंज़िल तो सिर्फ चल सकने भर का हौंसला है...
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दिनों की दौड़ती धड़कनों व रातों की मौज उठती सांसों के मध्य कहीं एक दिल हो नींद सा, हूकों व कराहों के बीच कहीं एक जगह बचे आह भर। चाहे न हो कोई बत्ती चौक में, यातायात तूफान भरे, एक ख्वाब भर उड़ान हो एक हवा चले सुकून भर।

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मुझे तुमसे कभी कुछ नहीं कहना होता, ज़रूरी या अर्जेंट जैसा तो कभी कुछ नहीं बस तुम्हारी आवाज़ सुन सकने और खो जाने के मध्य कुछ नहीं कह सकने की स्थिति में कुछ बना कर कह देने भर ज़रूरी हैं कुछ बीती बातें 
...वरना तुम्हें देखना, तुम्हारी खनक सुनना वैली ऑफ़ फ्लावर्स की रंग बदलती संगीतमय घाटिओं के मध्य घिरा होना है .........उनींदा आँखों को जब पीसो तब आश्चर्य।

.....सुनो ये घाटी रोज़ अपने रंग बदलती है तुम ख्याल करना।


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क्षितिज पर का आधा सूर्य हो तुम। और मैं, मैं एक उदास धुन....

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एक गुज़रा हुआ दिन अटक के यूँ पड़ा हुआ ज्यूँ चाँद चेहरे के गले सुरीला रेशमी रेशा औ जां सुर्ख सूरज टंगा हुआ मोती के जैसा!

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मैं यात्रायें करता हूँ, उस प्रकिया से गुज़रना बेहद सुखद है भले ही फिर वह जगह कुछ दिनों में कचोटने लगे... यह ज़रूरी है, अवशेष रह जाएँ, जगहें बदलती रहें, यात्राएं बनी रहें !

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हर घर की कुछ ना कुछ जरूरत होती है, कभी महज़ एक घर की जरूरत होती है!

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मैं जब यहाँ से चला अपना बीता यहीं छोड़ गया.. कारण साथ रहे ये कभी ज़रूरी नहीं था पर जो साथ रखी वो यंत्रणाएँ थी.. स्वीकारूं, मैं कष्टों से उत्पन्न सुखों को खुद से अलहदा नहीं रख पाया। 
मैं लोगों से जुड़ा उनकी तमाम कमज़ोरियों की वजह और उनसे अलग न हो पाना मेरी उतने से अधिक कमज़ोरियाँ..


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Thought continues..


"Let's not talk about pain or suffering or create the one is never felt ever..!"
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"Every space between the words is the most needed distance, every silence is the most melodic sound, every departure is the most possible arrival, every separation is the most hopeful spring..!"
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"Does anybody else love you like I?
Who keeps the cage open If not I!"


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"We chase for good to happen to us, the problem is we chase happening !"

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"And this goes in progression, my birds tell me the morning and the wine tells me the night."

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"What kills is not cigarette, not wine not even love, what kills is that horrible thought of being killed.. What kills is got a life but not lived."

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"It's good to remain a kid..no one questions your sensitivity."

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"It is always a bliss when you don't know where you're heading to.. You can walk through and through.. The night I could have walked to the uncertainty but then I realized I have got a house a mile away and I had to turn back."

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"Falling in love is like making an art, you can't come over both!"

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"I have kept a letter in that empty envelope, words' got the feelings and it's got the soul..."

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A traveler must forget the roads !

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"In this empty house during the night hours a voice breaks the silence "somebody must be hiding behind the darkness, somebody must be lost within, somebody must be in a pursuit of his existence, somebody must be missed." 
Alas! 

These familiar barking of the unknown creatures.."

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you are in feeling all the time !

haha..yes I do..I told you,
I am wholeheartedly in feeling and I have got no sense of reality..

But you should..At least a part of you should..

with all the submissiveness and humbleness
I am an artist close to a great one and a lover affordable..I am a hippie and a human..I am a man with mustache..I can feel songs and the voices..I sway with trees in winds..I am a drop right from the clouds and I am one of a guitar strings..
..I am within the tumults of emotions...and for this sake I should have all the rights to leave this worldliness and get myself a shell..shell of feelings...!

If you are ready to leave the world only then
I can't find any flaw in your ideology...!

I am a non social being
living triumphantly in this suffocated hypocrite world..

hahaha..oh ho..have to bear with it anyhow..

haha..I am obsessed I told you..so don’t bear but live,
you too just live it and you are gonna love it..!!
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