Thursday, May 16, 2013

दुआ न माग, उम्मीद न लगा..


टूटे तारे से क्या माग
रहा है जीने की वजह,
जो खुद टूटा गर्दिश में
अब तेरे किस काम का..

पलक के टूटे बाल से
न कर उम्मीद,
की वो ना तो
आँख का ही अपना है,
न हवा का अपना..  

मंदिर तो जा
की वहाँ भगवान बसते हैं,
पर दुआ न कर उनसे
खुद होके शिकास्तां..

शिकयात न कर मुझसे
की मैं बुरा गाता हूँ,
बस मेरी धड़कने सुन
और मेरे गीत गुनगुना..

रास्ते लम्बे हैं
तो जरा मत डर,
के तेरी इक मंजिल तय है
रास्तों को है बस चलते रहना ..

तू चिराग तो जला
जो रात काली है,
रात का अपना काम है ये,
के उस पर आँसू न बहा..

Wednesday, May 1, 2013

Thy Art



The moments I spend thinking about you, 
it is an essence of the perfumed meadow your are laying on..
Spring falls all over, aromatic,
rivers dancing and twilight gives passage to moon.
Night birds singing, embracing each others in celebration.
Elated around, joy is like fog
stealthy enveloped from either sides,
here, there,
and everywhere..

Those live moments when you are virtual
but appear in my thoughts…
People claim to have seen the beauty,
but I have seen you and your artistic presence...

Friday, April 5, 2013

सआदत हसन मंटो


 मेरी मंटो से खासी दोस्ती हो गयी है, यूँ तो उसे मरे कई ज़माने बीत गए, लेकिन उसके ये शब्द "हो सकता है की सआदत हसन मर जाये मगर मंटो हमेशा जीता रहेगा" हर वक़्त ये एहसास दिलाते रहते हैं की वो खुद को कितना खूब जान चुका था। उसे हिसाब था की उसके द्वारा लिखा गया एक एक शब्द इतिहास बन जायेगा और मंटो हमेशा जाना जायेगा।
होता भी क्यूँ न, मंटो की लेखनी, उसकी शैली उसे हमेशा एकाकी रखती है।  वह बहुत आम होते हुए भी ख़ास था। उसका अनूठा  द्रष्टिकोण व मार्मिकता उसे उसके जानिब बहुत सारे कथाकारों से अलग करती है। मंटो की कहानियों में तब का समाज मौजूद था, उसकी कहानियों के विषय समाज में फैली हुई त्रुटियाँ थी, उसे बंटवारे का दुख था व महजबी होते हुए भी, महज़ब के नाम पर लोगों के बीच होने वाले फासलों को मंटो ने खूब पहचाना और बखूबी अपनी कहानियों में उतारा। मंटो स्पष्टवादी व खुले विचारों वाला एक साधारण सा बल्कि यूँ कहें की पागल सा दिखने वाला पर एक असाधारण विचारक था। उसे अपने आस-पास होने वाली सभी क्रियाएं साफ़ साफ़ नज़र आती थी। एक सामान्य सी जिंदगी जीने वाली एक ग्रहणी से कहीं ज्यादा उसे सड़कों व चकलों पर जिस्म बेचती वेह्श्याओं पर अधिक हमदर्दी महसूस होती थी, उसका चित्रण भी वो बिल्कुल सटीक व स्पष्ट किया करता था। वह समाज में छुपे हुए नंगेपन को बिल्कुल बेशर्मी से समाज के आगे रख देता तो उसे अश्लील लेखन व कानून की खिलाफत करने का कुसूरवार समझा जाता और कई बार तो इस बाबत उसे अदालतों में भी घसीटा जाता था। मात्र 43 साल के अल्प जीवन में मंटो की लगभग पांच कहानियों पर कोई उतने ही मुक़दमे ठोके गए, परन्तु उसकी खुली कहानियां उसके जबरदस्त प्रतिरोधक विचार-धारा का स्पष्ट प्रमाण थी। जहाँ पूरे शहर में लोग बंद आँखें लिए, मुह को सिये हुए बेचारे से बने घूमते थे वहीँ मंटो एक क्रांतिकारी सोच व एक निडर व्यक्तित्व का स्वामी था। उसके लिए कहना बिल्कुल माकूल होगा की अँधेरे में रहने से अधिक वह खुद जलकर दुनिया को उज्वलित करने पर ज्यादा भरोसा रखता था। वह तूफ़ान से घबरा कर आंसू बहाने वालों में से नहीं था बल्कि तेज़ हवाओं की दहलीज़ पर अपने चिराग रौशन करता था।
मंटो सच में पागल था, वो पागल आज कल मेरे दिल के जेलखाने में रहता है।
मगर मंटो क़ैद नहीं हो सकता, जबसे वो दिल में आया है
यूँ लगता है की दिल को पर लग गए हैं, वो कभी उड़ता हुआ फेफड़ो
तक पहुँचता है तो कभी पेट में शोर पैदा करता है।
मंटो को कोई नहीं बाँध सकता
वो आज़ाद है, यह ही मंटो में ख़ास है।

मंटो के उन्मुक्त लेखन की एक झलक उसी ही की एक छोटी सी कहानी से।


"करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए.
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे,
कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौक़ा पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें.
एक आदमी को बहुत दिक़्कत पेश आई. उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दूकान से लूटी थीं. एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा ख़ुद भी साथ चला गया.
शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये. कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं.
जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया.
लेकिन वह चंद घंटो के बाद मर गया.
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था.
उसी रात उस आदमी की क़ब्र पर दीए जल रहे थे."
--सआदत हसन मंटो

आज तक मैंने जितना भी थोडा बहुत मंटो को पढ़ा, उसकी जीवनी को यू-ट्यूब पर देखा, उसके बारे में लोगों से जो भी सुना वह सब स्पष्ट कर देता है की मंटो बहुत थोडा जिया पर उसने अपने होने को निभाया था। वह कभी बंध कर नहीं रहा, आज़ाद पंछी की तरह जो चाहा वो किया। उसने कभी किसी को प्रभावित करने के लिए नहीं लिखा वो लिखता था क्यूंकि वो कुछ बयान करना चाहता था। उसकी हर बात में एक फरमान एक ऐलान शामिल था।

               

Saturday, March 23, 2013

इंक़लाब जिन्दाबाद...



भारत रत्न भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के शहीदी दिवस पर--

23 मार्च यानी आज ही के दिन सन 1931 को भारत के तीन रत्न भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव शहीद हुए थे, वे फंसी पर लटका दिए गए थे, उन्हें एक स्वतंत्र भारत के सपने देखने का दोषी पाया गया था..ब्रिटिश सरकार व भारत के तरक्कीपसंद खुदगर्ज़ समाज द्वारा उन्हें बागी व फसादी बताया गया..मगर ये उनकी जिन्दादिली व कभी न ख़त्म होने वाला देश प्रेम ही था के आज भी उनका नाम हर एक भारतीय द्वारा गर्व से पुकारा जाता है, जिनका नाम आते ही होंठों पर इन्कलाब व शारीर में देश के लिए कुछ कर गुजरने की हसरत कंपन का रूप ले लेती है..वह जज्बा रेंगटे खड़े कर देने वाला होता है..वह हौंसला दिलों को देहला देने वाला व वह पल विजय का बिगुल बजने का होता है..

"दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त, मेरी मिट्टी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी।"

भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव द्वारा फंसी से पहले बोले गए ये शब्द अपने आप में बयां कर देते हैं की 23 मार्च 1931 को हमने न केवल तीन स्वतंत्रता सेनानी खोये थे बल्कि वो कोहिनूर थे के जब तक जीए बस जगमगाते रहे, वो मशाल थे स्वतंत्रता संग्राम की, घुप अँधेरे में आस व प्रकाश की एक जगमगाती लौ..वे मरे नहीं, वे आज भी जिन्दा हैं, न केवल भारतियों के बल्कि विश्व भर में लगभग हज़ारों-लाखों लोगों के जीवन में प्रेरणा स्रोत के रूप में..वे दिव्य ज्योति की तरह हर मंदिर, हर गुरु द्वारे, हर चर्च व हर मस्जिदों में जिन्दा हैं..सभी धर्म जाती से परे, वे मानवता में जिन्दा हैं..
वे इतिहास की किताब में त्याग व साहंस के एक सुनहरे पन्ने के रूप में अमिट अंकित हैं..
वे अमर हैं
वे जीवित हैं...
इन्कलाब जिंदाबाद, इन्कलाब जिंदाबाद..
भगत सिंह अमर रहे, सुखदेव अमर रहे, राजगुरु अमर रहे..
शहीदों को तहे दिल से भावभीनी श्रधांजली अर्पित करते ये मेरे कुछ शब्द..


Thursday, February 28, 2013

नदी, नाले



अजीब विडम्बना है भारत में,
यहाँ नदियाँ सूख जाती हैं,
और नाले छलकते रहते हैं...
यहाँ नदियाँ "नाले" हैं,
और नालों का जल पेय है..
नाले तो यूँ ही बदनाम होते हैं,
यहाँ तो नदियों के हाल बेहाल हैं..
कूड़ा करकट, गोबर कीचड़,
नालों की पहचान जो हैं,
और नदियाँ जो पवित्र हैं कहने को,
औद्योगिक अवशेष और प्रदूषण 
की सबसे बड़ी मिसाल ये हैं   
रोज़, सुबह-शाम हर घाट पर पूजी जातीं बड़े प्यार से,
अंतत: सब पुष्प, दीप, 
स्नेह श्रद्धा सब इनमें ही बहा दी जाती हैं,
कहने को तो नदीपान से कई रोग, घाव भर जाते हैं,
पर जल से इनके इंसान तो क्या, 
कलकत्ते में मछलियाँ तक मर जाती हैं,
यहाँ पर्वत शिखर से निरंतर बहती नदियाँ 
अंत में नालों में मिल जाती हैं..
और कभी पहचान ही मुश्किल हो जाती है,
की ये नाले हैं या नदियाँ बहती हैं....

Wednesday, November 14, 2012

क्यूंकि आज बाल दिवस है, मेरी मुन्नी का दिन..


उस रात की बात है,
सड़क किनारे एक झुग्गी के बाहर
छोटी सी लड़की रोती थी
हाथों में कुछ गुब्बारे लिए,
मायूस सर को झुकाए,
सुकबुकाते हुए कुछ कुछ बढ़-बढाती थी,
भूरे उलझे बाल, मुरझाया चेहरा व
छोटे-छोटे पैरों पर ख़राशों  के निशान,
देर से अपनी फैली लटकी फ़्रोक की फटी जेब टटोलती,
हारकर अपने कोमल हाथों को मलती रही,
अब्बा ने पुचकार कर जो पूछा कि
 "क्या हुआ क्यूँ रोती है"?
रोक नहीं पायी खुद को,
रोती हुई बिखर गयी नन्ही जान अब्बा की गोद में..
आँसुओं से लडती हुई, कुछ संभलते हुए बोली
आज सड़क पर दिन भर में एक भी गुब्बारा नहीं बिका
आज तो बाल-दिवस था न, बच्चों का दिन,
मैं भी तो बच्ची हूँ न?
फिर भी मेरे गुब्बारे क्यूँ नहीं बिके??
तरलता में लिप्त मासूम सी आवाज़ में एक बहुत ठोस सवाल!
अब्बा ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए,
गुच्छे में से एक गुब्बारा निकाल कर
देते हुए कहा
"बेटी आज गुब्बारे इसलिए नहीं बिके
क्यूंकि वो मेरी मुन्नी के पास ही रहना चाहते थे,
आज बाल दिवस है न मेरी मुन्नी का दिन.."
नादान मुन्नी अब्बा की बातों में आकर
खिलखिलाती हुई गुब्बारे से खेलने लगी
और अब अब्बा अपना बुझा हुआ सा
चेहरा झुकाये न जाने किस सोच में पड़ गए...

Monday, October 22, 2012

My DraWinGs..

Everything has beauty, but not everyone sees it.




Women encourage men
to be childish, then scold them. 

Mason Cooley 




Soul that stays in peace can uphold all it's dreams for long..
-Me

Three things cannot be long hidden: 
the sun, the moon, and the truth. 
-Bhuddha 
 The evening prayer..



Do not overrate what you have received,
nor envy others. He who envies
others does not obtain peace of mind. 

Buddha 

Don't limit a child to your own learning,
 for he was born in another time. 
Rabindranath tagore
(poet and Novelist English language)
(7 May 1861 – 7 August 1941)

 


These can never be true friends: Hope, dice, a prostitute, 
a robber, a cheat, a goldsmith, a monkey, a doctor, a distiller.
Khuswant singh(Novelist English language, journalist and historian)(feb, 2, 1915 to present)(age 97)



दीप मेरे
दीप मेरे जल अकम्पित,
धुल अचंचल !
सिन्धु का उच्छ्वास घन है,

तड़ित् तम का विकल मन है,
भीति क्या नभ है व्यथा का
आँसुओं से सिक्त अंचल !
Mahadevi verma(poet hindi language
and freedom fighter)
(may 26, 1907 – September, 11, 1987) 

 Ghost is but an illusion, because
nothing is as scary as you all..

--Me

I like to go into a little shell and 
be a hermit and make music for a while. 
by Delta Goodrem..

Vintage shoes..

The only thing worse than being blind is having sight but no vision. 
(Helen Keller)..

There is no more lovely, friendly and charming relationship, communion or company than a good music(martin luther)..I love My realtionship with music..



It is true that liberty is precious; so precious that it must be carefully rationed. 
Vladimir Lenin 


 

I don't care if I fall as long as someone else picks up my gun and keeps on shooting. 
Che Guevara


हलाल और झटका

“मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया.”
“यह तुमने क्या किया?”
“क्यों?”
“इसको हलाल क्यों किया?”
"मज़ा आता है इस तरह."
“मज़ा आता है के बच्चे.....तुझे झटका करना चाहिए था....इस तरह. ”
और हलाल करनेवाले की गर्दन का झटका हो गया.
सादत हसन मंटो (may 11 1912 to January 18 1955)


















"जो आदमी दूसरी कोम से जितनी नफरत करता है 
       समझ लीजिये की वो खुदा से उतना ही दूर है.." 
       उपन्यास सम्राट श्री मुंशी प्रेमचन्द( (July 31, 1880 – October 8, 1936)




"What good fortune for governments that the people do not think."
--Adolf Hitler the leader of the Nazi Party (20 April 1889 – 30 April 1945)




"Life is a tragedy when seen in close-up, but a comedy in long-shot."
  The comedy king Charlie Chaplin(16 April 1889 – 25 December 1977)