Thursday, April 17, 2014

"एक सामान्य सुबह"

मेरी आँखों के ठीक सामने एक दिवार है 
पैंसिल से कि लकीरों से भरी हुई..
मेरी तीन साल की भतीजी अब नज़रें चुरा रही है।

अन्दर रसोई में धीमी आंच पर दूध रखा है 
उसकी महक बाहर अगले कमरे तक जा रही है।

कमरे में दो कुर्सियां अब भी ऊंघ रही हैं कि उन पर 
अब तक कोई नहीं बैठा है।
बिस्तर करीने से बैड पर रखा है,
मेरी बड़ी भतीजी अब भी सो रही है।

सुबह का वक़्त है घर में शंखनाद हो रहा है,
मेरी माँ बाहर पौधों को पानी कर रही है,
क्यारी में दो गुलाब खिले हुए एक साथ मुस्कुरा रहे हैं,
सूरज मेरे घर से सिर्फ दो छलांग भर की दूरी पे है।

मैं बाहर बरामदे में बैठा हूँ,
कल रात की बरसात फाइबर वाली छत से अब भी टपक रही है,
मैं टपकती बूँदें देख रहा हूँ।
मेरे ठीक सामने मेरा बड़ा भाई अखबार पढ़ रहा है
उसने हाथ में चाय का गिलास पकड़ा है,

मैंने कलम पकड़ी है। 

Sunday, April 13, 2014

तीन छोटी कवितायेँ

1.
कविता कोई टखियाई वैश्या नहीं 

जिसे सुन्दर-सुन्दर शब्दों में लपेट कर
भिन्न-भिन्न उपमाओं, अलंकारों से सजा कर 
व बालों में गुलाब खोंस कर 
वाह-वाही बटरोने के लिए बाज़ार में छोड़ दिया जाए। 

कविता की क्षमता अस्त्र सरीखी है,
एक सशक्त अभिव्यक्ति! 
जो लाचार नहीं बल्कि स्थिति का सत्य 
उसका सबसे बड़ा प्रमाण होती है।
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2.
मेरी कविता अचूक होगी, 
कई अवरोधों को भेदती सीधी जा गड़ेगी 
उन छातियों में जहाँ दिल होगा... 

क्योंकि आंतरिक घाव कभी नहीं भरते 
बल्कि वक़्त द्वारा रचे षड्यंत्र के अंतर्गत 
उनके साथ जीने की बुरी आदत पड़ जाती है।

इसलिए चोटों को सहलाने वाले कोमल हाथों से 
ज़रूरी है ख़ुरदुरे स्पर्श,
सहानुभूति से अधिक ज़रूरी है धिक्कार,
मरहम से अत्यधिक ज़रूरी है नमक !

जिस प्रकार मृत्यु जैसे आरामदेह विकल्प से
कहीं अधिक ज़रूरी है दुष्कर जीवन..!!
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3.
अवसादों से निरंतर जूझना,
लड़ते-लड़ते गिरना, फिर उठना,
औंधे मुहं गिरना, उठ-उठ कर झड़प करना, 
मुठभेड़ों में चारों खाने चित हो पड़ना, 
चाहे धूल चाटना या रगड़ खाना, 
या फिर विचारशून्य हो फड़फड़ाते रहना। 
मगर फिर-फिर उठना, कलम पकड़ना, 
गुजरना, नए अवसर गढ़ना, 
तुम लड़ते-लड़ते जीवित रहना।

क्योंकि जीवन नियति द्वारा 
स्थापित कोई स्वर्ण प्रतिमा नहीं 
बल्कि संघर्षों की चाक पे गुंथा 
अवसरों का बर्तन होता है

Wednesday, March 26, 2014

"प्रेम के प्रति"





प्रेम के प्रति मेरी बस यही राय है कि 
रात (जिसके पास चाँद है) की सुबह हो जानी है।
लोग जो कब्रों में दफना दिए गए थे
मरणोपरांत उनकी डैक पर गुलाब रखे जाते हैं।
चूँकि पूरी देह के जल चुकने के बाद भी अस्थियाँ बची रह जाती हैं, 
उन पर आत्मा का प्रभाव शेष रहता है, 
अत: उन्हें जीवित ही नदी में स्वाहा दिया जाता है!!
कल्पनाओं के तीव्र घोड़ों पर सवार भावनायें भयातुर रहती हैं, 
उनके गिर जाने का डर बना रहता है!
व बिजली कड़कने मात्र से बरसात डरावनी लगने लगती है,
अन्यथा अद्धपकी फसलों पर गिरी पहली बूँद का स्वाद मीठा ही होता है!!

प्रेम खुद में पनपने वाला एक ऐसा संक्रमण है
जिसका "बिछड़ने" वाली प्रक्रिया से कोई लेना देना नहीं होता!!

Tuesday, March 18, 2014

"प्रेम कविता लिखते हुए"




मुझे एक प्रेम कविता लिखने को कहा गया।
मैंने अपनी जेबों में हाथ डाला,
स्मृतियाँ टटोलीं, अनुभवों के जितने थे
गढ़े मुर्दे उखाड़े व सन्दर्भों के सभी चिठ्ठे फाड़ डाले,
लेकिन अतीत से कुछ भी विशेष हासिल न कर सका!

न ! प्रेम से मुझे कोई पैदाशयी नफरत नहीं रही,
अरे मेरा तो जन्म ही प्रेम के आधार पर हुआ था।
प्रेम के चरम पर ही तो मैंने विभत्सता, द्वेष व ईर्ष्या
जैसे अत्यधिक भौतिक शब्द(दुनियादारी के लिए सटीक) सीखे,
नफरत भी!

सच तो ये है कि
मैं जब-जब रोया या तो प्रेम के अभाव में
या प्रेम भाव में रोया।
व प्रेम ने ही तो मुझमे
संवेदना जैसा बहुत ही गैर ज़रूरी बीज भी बोया।

मैं कभी सही गलत का अंतर नहीं समझ पाया
बल्कि सीखा पक्षपात करना,
प्रेम को आधार बना कर मैंने कमज़ोर मित्र बनाये,
(अपनी असफल छवि से
निजात पाने हेतु तैयार कई सफल क्लोन!)
और उनमे बेहतर खुद को ढूँढा।

मैंने ईश्वर को प्रेम से सम्बोधित कर
पूरी इंसानियत को नकार दिया,
पुण्य को हमेशा पाप से ऊपर आँका,
व प्रेम के बदले प्रेम चाहा।
(इस तरह मैंने प्रेम की मौलिकता का हनन किया।)
मुझे तैरना नहीं आता था
परन्तु मैंने प्रेम के अनकंडीशनल होने का दावा किया
और इस तरह एक उत्तम तैराक को डुबोना चाहा।

मैंने प्रेम को मनगढ़ंत तरीकों से अभिव्यक्त किया।
प्रेम पर कई परिभाषाएं गढ़ दीं,
व उसे अपेक्षाओं के तराज़ू पर रखा।
मैंने प्रेम से लेन-देन व सौदाबजी करना सीखा,
व किसी पाखंडी धर्म प्रचारक की तरह
प्रेम को प्रेम कह कर ताउम्र वाह-वाही बटोरी।
(इस तरह भावनाओं के बाज़ार का सबसे बड़ा व्यापारी बना।)

परन्तु सच तो ये है कि मैं जीवन भर प्रेम के अर्थ से छला गया
व प्रेम की चिकनी सतह पर बार-बार बार फिसला।
मैंने अपना प्रेम दूसरों पर अहसानों की तरह थोपा
व बदले में उनसे सूद बटोरना चाहा।
पहले मैंने दुखी होना सीखा व फिर दुखी रहना।

और इस तरह प्रेम बिंदु से शुरू कर
दुख, अवसाद, कुंठा, निराशा व घृणा तक का सफ़र तय किया
व अंतत: प्रेम में लिप्त ईश्वर को पूजते-पूजते नकार दिया।
   

Tuesday, February 25, 2014

"सूर्य अस्त"




मैंने देखा है सूरज को भी जलते, बुझते, फड़फड़ाते हुए
संघर्ष करते, पसीने बहाते हुए।
नियति की मार झेलते किसी काले बादल के पीछे
निस्तेज मुख को छुपाते हुए मैंने देखा है।

मैंने देखा है सूरज के हाथों में त्याग-पत्र। 
उसके ललाट पर चिंताओं की महीन रेखाएं 
अवसादों की गर्द से फीका पड़ा अलोक।
मैंने देखी हैं मजबूरियां,
जिम्मेदारियों के बोझ तले
दबते हुए उसके जोश को मैंने देखा है।

ठीक दोपहर-
युवावस्था में हांफते, लम्बी आहें भरते,
मस्तिष्क पर चक्रवात व आँखों पर अंधकार झेलते
उसके कमजोर पड़ते
कदमों को लड़खड़ाते हुए मैंने देखा है।

मैंने उजालों की अथाह मांगें देखी हैं।
बगावत के ऊँचे स्वरों में रौशनियों को नारा लगाते सुना है,
अगिनत किरणों को षड्यंत्रों के चक्रव्यूह रचते,
अनंत अपेक्षाओं और दबावों से बिगड़ी जलवायु
व वातावरण की असहजता को मैंने देखा है।

मैंने कटने से पहले ही फसलों को उजड़ते हुए देखा है,
भांपा है मायूसी को, सन्नाटों के छिद्रों से
फूटते उद्वेगों को महसूस किया है।
विषाद से भरे हुए, रुदन में सिक्त
बेवक़्त चढ़ती रात में
मुरझाये हुए सूरज को अस्त होते हुए मैंने देखा है।। 

Thursday, February 20, 2014

"काला इंद्रधनुष"




मैं कहता हूँ काले में सारे रंग देख ले,

जा तुझे मोक्ष कि प्राप्ति हो...
मात्र रंगों द्वारा छले जाना ही 
क्या आदर्श जीवन के संकेत हैं?

हो ऐसा कि तेरे पंख काट के फैंक दिए जाएँ 
तेरी ज़ुबान को मोड़ कर उस पर 
कसके एक गाँठ बाँधी जाये,
बुद्धि पर जंग लगे ताले फसा दिए जाएँ
और मायूस होने की लत पड़ जाने तक
तुझे सपनों के चलचित्र दिखाए जाएँ।
(चित्रों में सातों रंग व कुछ और मायावी रंगों का अनोखा समावेश हो)
और फिर अकस्मात ही तुझे
अवसाद, पीड़ा, निराशा
जैसे शब्द रटाये जाएँ,
तू तड़पे, घुटे, तपे, बुझे
जा तू जीते जी मरे,
तुझे ज्ञान प्राप्त हो"
बुद्ध का सा भ्रम हो
और तू ईसा के पुनर्जन्म को तरसे।
अतीत कि सभी विफल लकीरें
कोड़ों से पीठ पर गाढ़ दी जाएँ
व जब-जब तू मुक्ति को रोये
तुझे अपराध बोध पिलाया जाए।
तेरे माथे पर शिकन खिंचे,
व तेरे चेहरे के आलोक पर
भयानक नज़र भट्टू पड़े।
तुझ पर सिद्धांतों के सरियों से
नैतिकता की चोट पड़ें,
तेरा आत्म सम्मान हताहत हो,
और स्वाभिमान गिरे पड़े।
जिन चेहरों पर करुणा ढूंढे
तुझ पर थूक-थूक के जाएँ,
तू चूर चूर हो बैठ जहाँ
कव्वे तुझ पर बीट गिराएं।
तेरे धड़ पर दुखों के बरगद
व सर पर कैक्टस उग आये
जड़ों पर तेरी कुत्ते मूतें,
रातों में चमगादड़ मंडराएँ।

मात्र रंगों द्वारा छले जाना ही
क्या आदर्श जीवन के संकेत हैं?
मैं कहता हूँ काले में सारे रंग देख ले,
जा तुझे मोक्ष कि प्राप्ति हो...

Sunday, February 16, 2014

"तपता भूमण्डल"






मेरी चीखें अकेले ही निपट लेगीं
दुनिया भर के सन्नाटे से। 
अँधेरे से कई तरंगें उभरेंगी, 
तैरते इंसानों के सर नहीं दिखेंगे,
व भूमि सतह से नहीं आंकी जा सकेगी।
जब पेड़ों की जड़ें आपस में उलझ रही होंगी, 
तब कोसों दूर किसी दूसरे जंगल में 
घर्षण से आग की लपटे उठेंगी। 
गर्मी से झुलस रहे कंकाल चादरों से चिपकने लगेंगे, 
और कुत्ते गलियां छोड़ घरों में जा छिपेंगे।

तथ्यों व दस्तावेजों की आंच पर पड़े-पड़े पृथ्वी  
धीरे-धीरे सिकुड़ रही होगी 
और इंद्रधनुषों के गलने से 
एक असहनीय गंध का आविष्कार होगा। 

जिस आखरी दिन उल्काएं आकाश का हृदय भेदेंगी, 
धरती पर तकनिकी विकास अपने चरम पर होगा।