Monday, March 21, 2016

ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें।

तुम्हें पता है कुछ चीज़ों के पीछे कोई लॉजिक्स कोई तर्क नहीं होते, वे बस होती हैं.. उस ही तरह सब होता चला गया। दरअसल हम सभी खुद में एक रिक्तता सहेजे रहते हैं, एक ऐसा भाग जिसे हम नहीं चाहते कोई छुए... हमारा अपना भाग, हमारे खुद के लिए एक स्पेस, एक कम्फर्टेबल शैल जहाँ सिर्फ हम होते हैं.. वहां ना कोई दुनियादारी होती है ना कोई इम्प्रैशन ना कोई भार.. वो हमारा हिस्सा होता है, वहां जो संगीत होता है वो भी हमारा निजी होता है, हर आवाज़ हर शब्द हमारा अपना... उस रिक्तता को हर कोई नहीं भर सकता पर जीवन में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब हमारे हाथ में कुछ नहीं होता, हम अपनी रिक्तता से भी रिक्त हो जाते हैं, पता नहीं कहाँ से कोई आहट होती है और अंतर के अनंत निर्वात को अपने स्नेहिल स्पर्श से भर देती है... हर उजाले की तह में एक अँधेरा छुपा होता है जिसे हम नहीं पहचान पाते, जिस तरह चौंधिया देने वाली रौशनी में फिर कुछ नहीं दिखता, असल में हम खुद के आलोक में खुद को नहीं पहचान सकते, हम सबसे ज़्यादा जिससे गैरवाकिफ होते हैं वे हम खुद हैं.. असल में हम अपने खुद की शान्ति में सबसे बड़ा अवरोध साबित होते हैं... हमारे अंदर एक खोज, एक तलाश निरंतर बनी रहती है... और जब उसकी नस पर कोई हाथ रख उसे सहलाता है ना तो बड़ा आराम मिलता है... और उस स्थिति में कोई ऐसा हमारे दिल को छू जाए तो फिर हम मुक्त हो जाते हैं... हम अपनी उस रिक्तता से उत्पन्न आनंद को साझा करना चाहते हैं... हम आज़ाद तो होना चाहते हैं पर बड़े एहतियात से... हम उड़ना चाहते हैं पर फिर ये भी चाहत रहती है कि कोई हो जो हमें उड़ता हुआ देखे और हाथ हिलाये ये उस रिलीफ फीलिंग जैसा होता है कि वहां निचे कोई है जिसे तुम्हारे सहजता से लौट आने का इंतज़ार है... मुझे इंतज़ार में बने रहना बेहद पसंद रहा है ये वक़्त उम्मीद से भरा होता है... मुझे आज भी याद हैं वे दिन जब बचपन में माँ को कभी बाहर जाना होता था तो वो हमें ताले में बंद कर जाती थी, और फिर उस कमरे में हम बिलकुल अकेला होते थे, बिलकुल अकेला जैसे यहाँ इस वक़्त, इन दिनों। बिलकुल अकेला पर मुझे निजी तौर पर कभी उस अकेलेपन में डर नहीं लगा क्योंकि वहां बेफिक्री रहती थी मुझे पता रहता था कुछ देर में माँ आएगी और मुझे अपने स्नेहिल हाथों से सहला कर सीने से लगा लेगी, और उस बेफिक्री में वो अकेलापन मुझे बेहद भाता था, ऐसे जितने भी टुकड़े मैंने बचपन में अकेले बिताये मैं उतना ही खुद के करीब आता चला गया और बिलकुल ठीक ऐसा मुझे अब भी महसूस होता रहा है.. पर यहाँ वो इंतज़ार तुम्हारे लिए था.. मैं बेफिक्री से इतंजार करता रहा हूँ तुम्हारा, क्योंकि उस इंतज़ार ने मुझे खुद के और करीब ला कर खड़ा कर दिया है... मेरी तमाम उलझनों, तमाम कमज़ोरियों के बावजूद भी तुम हो ये बेहद ख़ास है और तुम्हारा ना होना भी कुछ बदलेगा नहीं, जीवन उस ही तरह, उस ही धारा में चलता रहेगा, दर्द होगा, अनुभव मिलेंगे, कई बदलाव भी आएंगे पर वो सभी चीज़ें मैं तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ दरअसल मैंने अपनी रिक्तता तुम्हारे साथ सहजता से साझा की है और अब मैं उस आनंद को महसूस करने लगा हूँ... लाज़मी है कि मुझमे तमाम कमियां शामिल हैं पर सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि इन सभी चीज़ों के ऊपर एक चीज़ है, भाव... सिर्फ इतना भर जानता हूँ कि मेरे लिए जुड़ाव एक वैल्यू का हिस्सा है, मैं वो वविंग हैंड बनना चाहता हूँ जिसके होने पर तुम बेफिक्र अपनी उड़ान भरो और बढ़ती चली जाओ... तुम्हारा होना दरअसल रंगों से भरता रहा है मुझे और शायद तुम जानती हो कि मुझे ब्रश से उम्मीदें उकेरना भी उतना ही पसंद है जितना कि शब्दों से प्रेम लिखना।


3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 28 मई 2016 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. मुझे आज भी याद हैं वे दिन जब बचपन में माँ को कभी बाहर जाना होता था तो वो हमें ताले में बंद कर जाती थी, और फिर उस कमरे में हम बिलकुल अकेला होते थे, बिलकुल अकेला जैसे यहाँ इस वक़्त, इन दिनों।।
    अच्छा नहीं लेकिन हमारी भी मज़बूरी हैं बच्चों को ताला बंद कर रखना .. लेकिन वे खुश रहते हैं एक टीवी देखने में और दूसरा कंप्यूटर में .. बड़े होने पर निश्चित ही वे भी इसे याद रखेंगे ... हमारा बचपन कैसे अभावों में रहा जो रह रह याद आता है ...

    जाने कितनी ही याद आने लगी हैं आपकी पोस्ट पढ़कर। ..

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