Monday, March 21, 2016

ज़िन्दगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें।

तुम्हें पता है कुछ चीज़ों के पीछे कोई लॉजिक्स कोई तर्क नहीं होते, वे बस होती हैं.. उस ही तरह सब होता चला गया। दरअसल हम सभी खुद में एक रिक्तता सहेजे रहते हैं, एक ऐसा भाग जिसे हम नहीं चाहते कोई छुए... हमारा अपना भाग, हमारे खुद के लिए एक स्पेस, एक कम्फर्टेबल शैल जहाँ सिर्फ हम होते हैं.. वहां ना कोई दुनियादारी होती है ना कोई इम्प्रैशन ना कोई भार.. वो हमारा हिस्सा होता है, वहां जो संगीत होता है वो भी हमारा निजी होता है, हर आवाज़ हर शब्द हमारा अपना... उस रिक्तता को हर कोई नहीं भर सकता पर जीवन में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब हमारे हाथ में कुछ नहीं होता, हम अपनी रिक्तता से भी रिक्त हो जाते हैं, पता नहीं कहाँ से कोई आहट होती है और अंतर के अनंत निर्वात को अपने स्नेहिल स्पर्श से भर देती है... हर उजाले की तह में एक अँधेरा छुपा होता है जिसे हम नहीं पहचान पाते, जिस तरह चौंधिया देने वाली रौशनी में फिर कुछ नहीं दिखता, असल में हम खुद के आलोक में खुद को नहीं पहचान सकते, हम सबसे ज़्यादा जिससे गैरवाकिफ होते हैं वे हम खुद हैं.. असल में हम अपने खुद की शान्ति में सबसे बड़ा अवरोध साबित होते हैं... हमारे अंदर एक खोज, एक तलाश निरंतर बनी रहती है... और जब उसकी नस पर कोई हाथ रख उसे सहलाता है ना तो बड़ा आराम मिलता है... और उस स्थिति में कोई ऐसा हमारे दिल को छू जाए तो फिर हम मुक्त हो जाते हैं... हम अपनी उस रिक्तता से उत्पन्न आनंद को साझा करना चाहते हैं... हम आज़ाद तो होना चाहते हैं पर बड़े एहतियात से... हम उड़ना चाहते हैं पर फिर ये भी चाहत रहती है कि कोई हो जो हमें उड़ता हुआ देखे और हाथ हिलाये ये उस रिलीफ फीलिंग जैसा होता है कि वहां निचे कोई है जिसे तुम्हारे सहजता से लौट आने का इंतज़ार है... मुझे इंतज़ार में बने रहना बेहद पसंद रहा है ये वक़्त उम्मीद से भरा होता है... मुझे आज भी याद हैं वे दिन जब बचपन में माँ को कभी बाहर जाना होता था तो वो हमें ताले में बंद कर जाती थी, और फिर उस कमरे में हम बिलकुल अकेला होते थे, बिलकुल अकेला जैसे यहाँ इस वक़्त, इन दिनों। बिलकुल अकेला पर मुझे निजी तौर पर कभी उस अकेलेपन में डर नहीं लगा क्योंकि वहां बेफिक्री रहती थी मुझे पता रहता था कुछ देर में माँ आएगी और मुझे अपने स्नेहिल हाथों से सहला कर सीने से लगा लेगी, और उस बेफिक्री में वो अकेलापन मुझे बेहद भाता था, ऐसे जितने भी टुकड़े मैंने बचपन में अकेले बिताये मैं उतना ही खुद के करीब आता चला गया और बिलकुल ठीक ऐसा मुझे अब भी महसूस होता रहा है.. पर यहाँ वो इंतज़ार तुम्हारे लिए था.. मैं बेफिक्री से इतंजार करता रहा हूँ तुम्हारा, क्योंकि उस इंतज़ार ने मुझे खुद के और करीब ला कर खड़ा कर दिया है... मेरी तमाम उलझनों, तमाम कमज़ोरियों के बावजूद भी तुम हो ये बेहद ख़ास है और तुम्हारा ना होना भी कुछ बदलेगा नहीं, जीवन उस ही तरह, उस ही धारा में चलता रहेगा, दर्द होगा, अनुभव मिलेंगे, कई बदलाव भी आएंगे पर वो सभी चीज़ें मैं तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ दरअसल मैंने अपनी रिक्तता तुम्हारे साथ सहजता से साझा की है और अब मैं उस आनंद को महसूस करने लगा हूँ... लाज़मी है कि मुझमे तमाम कमियां शामिल हैं पर सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि इन सभी चीज़ों के ऊपर एक चीज़ है, भाव... सिर्फ इतना भर जानता हूँ कि मेरे लिए जुड़ाव एक वैल्यू का हिस्सा है, मैं वो वविंग हैंड बनना चाहता हूँ जिसके होने पर तुम बेफिक्र अपनी उड़ान भरो और बढ़ती चली जाओ... तुम्हारा होना दरअसल रंगों से भरता रहा है मुझे और शायद तुम जानती हो कि मुझे ब्रश से उम्मीदें उकेरना भी उतना ही पसंद है जितना कि शब्दों से प्रेम लिखना।


Wednesday, March 9, 2016

"Mumbai diaries"



"When you become a character and the city becomes your dialogue."
With love to Mumbai <3heart emoticon
आजकल नींद कम ही आती है तीन चार घंटे कभी आँख लग गयी तो लगता है भरपूर नींद है.. अँधेरा अभी पूरी तरह छठा नहीं है और सामने की खिड़की से आकाश बेहद खूबसूरत नज़र आ रहा है.. सामने से चमचमाती हैडलाइटों में वाहन जगमगाते हुए एक कतार से गुज़र रहे हैं तो लग रहा है जैसे स्वप्न हैं विविध रंगों में... सोचता हूँ अगर यूँ ना होता तो क्या होता। अगर यहाँ ना होता तो कहाँ होता। किस हाल में होता, क्या कर रहा होता। हम सारी ज़िन्दगी कितने ही रूपों में अपने अस्तित्व का एनेल्सिस कर चुकते हैं, पर फिर भी एक बाधा बनी रहती है... एक सटल सी कन्फूज़न साथ चलती है और उस अनिश्चितता से ही एक रोमांच बना रहता है.. जीने में मज़ा आता है.. दिन कितना भी साफ़ क्यों ना हो पर सुबह का कोहरा सबसे ज़्यादा आकर्षक होता है.. उसमे से गुज़र कर निकल जाना कई विस्मयों को सफलतापूर्वक पार करने सी अनुभूति देता है.. हर वो चीज़ जो धुंधली है उसमे खोज का स्कोप बना रहता है.. आप जितना ज़्यादा उस धुंध में उतरते जाते हैं सिरे खुलते रहते हैं.. मैं सोचता हूँ कि ये रैस्टलैसनैस क्यों है, धैर्य क्यों टूट जाता है, ये उत्तेजना कहाँ तक साथ रहने वाली है और इससे क्या मिलना है.. पर मुझे लगता है कि ये स्वाभाविक है, अगर सांस चलती है तो दिल का धड़कना भी बनता है.. जीते जी जड़ हो जाना उस बाँझ पेड़ के सामान है कि जिसमे कोई फल नहीं लगता, उस बंजर बाग़ की तरह के जिसमे कोई फूल नहीं महकता।मुझे लगता है कि हर आदमी में एक पैशन होता है और ज़िन्दगी में एक बार ही सही पर उस पैशन को औबसैशन की शक्ल देनी चाहिए। मैंने कला को चुना या यूँ कहूँ की मुझे कला ने चुना तो इसमें क्या फ़र्क़ है.. पिछले कुछ समय से यहाँ घर से हज़ारों किलोमीटर दूर रह कर महसूस किया कि जीना असल में क्या है.. यथार्थ के पटल पर संघर्ष के क्या माने हैं.. कला किस हद तक कंस्ट्रक्टिव है.. यहाँ आये दिन न जाने कितने ही लोगों से मिलना होता है, कितने अनुभव ज़िन्दगी के पन्नों में दर्ज़ हो रहे हैं.. चमत्कार कोई सुपर नेचुरल चीज़ नहीं वो यहीं हैं हमारे आसपास, रोज़मर्रा की गतिविधियों में.. मैं आये दिन चमत्कृत होता हूँ.. और अभी इनसे भरा नहीं हूँ, हमें सरलता से जीना चाहिए, ताकि हम जीवन द्वारा चमत्कृत हो सकें। मैंने ये भी महसूस किया ये शहर वाकई कमाल है, इसकी हवा में ही एक आज़ादी है, जब से यहाँ हूँ एक अजीब सी थ्रिल महसूस करता हूँ, परेशानियां घेरे रहती हैं फिर भी कमज़ोर महसूस नहीं होता। जीवन जीने का एक मात्र तरीका यही है कि स्वाद लिए जाएँ। कुकिंग पसंद आने लगी है अब तो रेसिपी रेफेर करना अच्छा नहीं लगता, इसके रेफरेन्स से ज़्यादा सहज है कि खुद ही ट्राई किया जाए, जैसा भी पके, परोसा जाए क्योंकि जो हमारा अनुभव है, जो हम महसूस करते हैं सिर्फ वही हमारा सत्य है और वह जो हम रेफ्रेंसेज़ में पढ़ते हैं या दूसरों से सुना होता है वह किसी दूसरे का.. जब हम उससे जुड़ते हैं तो हम दूसरे के सत्य को अपना मान रहे होते हैं... वह मिथ्या है... ठीक वैसा कि क्लिफ जम्पिंग करने से पहले खुद को आखिर तक बचाए रखना व साथियों को कूदते हुए देखते कूदने के बाद की संभावनाओं का पूर्वानुमान लगाना।
तस्वीर : Raj Jain

"अलीगढ़"



"शेम"
अलीगढ़ ये केवल एक विषय नहीं है ना ही दो घंटे की सधी हुई, कसी हुई कोई विविध दृश्यों से भागती, रिझाती हुई फिल्म। अलीगढ तो ठहराव है.. यह तथाकथित समाज की स्वनिर्धारित नैतिकताओं के पीछे दबती हुई मानवीय संवेदना का संताप दर्शाती हुई कहानी है, यह कहानी है एक ६४ वर्षीय प्रोफेसर की, उसकी प्रौढ़ दुविधाओं की, उसके अविरत अकेलेपन की, उसकी प्रेममय प्रवृति व अस्वीकार्य संवेदनाओं की... यह कहानी उस शख़्स की नहीं जो एक होमो या गे है बल्कि ये कहानी चुनौती है हमारी उस संकुचित सोच के खिलाफ जो मानवता की आड़ में संवेदनहीनता के सर्वोच्च शिखर पर खड़े हो कर समाज के विकास के खिलाफ खोखली आवाज़ें व नकली आंसू बहाते हैं..ये कहानी है उन सभी बलात्कारी प्रवर्ति वाले तमाम नौजवानों की जो निर्भया कांड पर सबसे ऊँची आवाज़ में शोर मचाते सुनाई दिए गए, ये कहानी है हमारे खोखली नैतिकताओं की, ये कहानी है बदलाव के खिलाफ खड़ी अंध व कट्टर विचारधारा की, ये कहानी है गांधारी समाज की जिसने जन्म तो लिया खुली आँखों के साथ ही लेकिन कुछ एकालाप करती आवाज़ों के शोर की बिनाह पर खुद ब खुद आँखों पर पट्टी बांध ली.. उस भीड़ की जिसने खुद को धार्मिक, नैतिक, व संवेदनशीलता के आधार व्यक्ति विशेष से ऊपर ला खड़ा किया व खुद को समाज के नाम से हर उस व्यक्ति पर थोप दिया जिसने अपनी इंडिविडुअलिटी को सभी सरोकारों से ऊपर समझना चाहा। जिसने मानवता के आधार पर अपने दिल को संभाला व सोच को विकसित किया उस पर अमानवीय होने का दवा ठोका गया.. जिसने बदलाव की बात की उसे गैरसमाजिक बता कर उसके तर्कों को बिना सुने ख़ारिज किया गया.. हो सकता है कि आज मेरा ये कंटेंट कहानी पर बात रखते रखते आपको भटका रहा हो पर सार्वभौमिक मुद्दा यही है कि हमने खुद को आदी बना लिया है पूर्वनिर्धारित कथ्यों के आधार पर घुट-घुट कर जीने का और जो यहाँ खुली साँस भर जीना चाहता है हम जाने अनजाने उसकी इस अप्प्रोच से आहात होने लगते हैं.. हम बदलाव की बात करते हैं उस पर अमल भी करते हैं पर सिर्फ उस ही बदलाव पर जो हम चाहते हैं, हमें सही लगता है, किसी दूसरे के बदलाव की परिभाषा हमारी वाली से अलहदा हो जाये तो हम असहज होने लगते हैं.. हम उस बात को सामाजिक कांटे के आधार पर तोलने लगते हैं, उस सामाजिक आधार पर जो हमारी समझ व सहूलियत के हिसाब से बना है... मैं इतना सब इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मैं उस असहाय व संकोची प्रोफेसर की भावनाओं से भरा हुआ महसूस कर रहा हूँ.. फिल्म ख़त्म होने से एग्जिट करने तक, सड़क पर चलते हुए व घर पहुँचने तक जो एक बात मुझे कचोटती रही वह यह कि ये वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है जो जो लोग आत्महत्या करके मृत्यु को चुनते हैं असल में वे सबसे अधिक जीवन के प्रेम में होते हैं अगर उन्हें जीवन से प्रेम ना होता तो वे कभी दबाव महसूस नहीं करते, असामयिक मृत्यु को ना चुनते, उन्हें कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता, जीना उनके लिए मृत्यु सामान ही होना था। जीवन का सेंसेशन ना रहता ना मृत्यु का कोई भय पर नहीं जिन जिन लोगों ने स्व्हत्या को चुना ये जीते रहने की बाज़ी को हारते चले गए... दुखद है कि हम समाज की चिंता करते हैं, दुखद है कि हम लोगों को दूसरे लोगों से फ़र्क़ पड़ता है, दुखद है कि हम खुद को सही व दूसरों को गलत ठहराने की अजीब सी मानसिकता से ग्रसित हैं... दुखद है कि हम जीते कम हैं और आँकते ज़्यादा हैं... डॉक्टर श्रीनिवास रामचन्द्र साइरस गे नहीं थे वे प्रेमी थे, बस उन्होंने प्रेम की उस कड़ी को तोडा जो लिंगों तक सिमित रही.. इन सभी बातों के बीच जो अत्यधिक दुखद रहा वह ये था कि वो भाषा पढ़ाने वाला, कविताओं को जीने वाला प्रोफेसर किसी को अपनी बात नहीं समझा सका.. अपने बनाये शैल में एक धारा में बह कर जीवन जीने वाला वह सामान्य सा आदमी जिसको इस समाज ने धाराओं के जाल में फसा कर अदालत तक घसीटा, अपनी मुट्ठी में उपज रखने वाले उस प्रगतिवादी शख़्स का हश्र ये हुआ कि उसकी प्रेम से लबरेज़ आँखें कब भय से तिरने लगी वो भी नहीं समझ पाया। हालांकि अंत में उसे अदालत ने मुक्त छोड़ा परन्तु वह समाज द्वारा रची हुई नैतिकताओं की पहेलियों में इस कदर उलझता चला गया कि अदालत के फैसले एक दिन बाद ही शरीर त्याग कर सही मायनों में खुद का मुक्त होना चुना।

Tuesday, February 2, 2016

Thoughts continue - Part-2

"I wonder how well you read, I could only say "you" and you made the world look so beautiful to me after that."
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I look at moon, I sigh,
I open myself to the wind, I feel,
I listen to the music, I revive,
I hear your words, I create,
I love and that's how I meditate... 

"Mysteries of this w
orld are not to be riddled, but to be soaked.."

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"Poetry seems to me as a camera seems to the Cinematographer... My quest is not for writing but for seeking.... !"

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....It all started in autumns and drove me to winters..

"December is for both, To love the rose and to collect the petals"


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Mind is just a house for the liberated thought,
heart is just a refuge to the strayed love...

"Both are rendered from nowhere to nowhere !"

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"If you ever happen to love someone, love the way brush does it to the colors.."

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"If you would go on finding the reasons behind the war, you would not be able to bring the peace.."

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"Nights should be vacant for silence, peace and love... They all should replace the evils... Dogs should be the night angels.."

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"What kills is not cigarette, not wine not even love, what kills is that horrible thought of being killed.. What kills is got a life but not lived."

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"Falling in love is like making an art, you can't come over both!"

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"Don't be so vocal to every grief, every sorrow.. Don't descend it's intensity by doing that... Don't preach peace so loudly that you would end up shattering that.. Collect pain patiently it's worth of a treasure, don't devalue by expressing that.."

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"Books are indeed the best teachers, they teach us and set us free to taste the life.. We are best recognized not for books we have read but for the taste we have developed."

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"Live as silently as possible and choose death with little more silence!"

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You should be an image blurred, I should be a broken glass.. My love be a little damage and I demolish the rest of it... Let we both feel free afterwards..!
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"Only sometimes that we can feel the morning turns grey and then turns into sepia."

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Sunday, December 27, 2015

"घर"






"उजला ही उजला शहर होगा जिसमे हम तुम बनाएंगे घर"

इस गीत में इतना कुछ कहा जा चुका है कि अब बस इसे रिवाईंड करती रहना, परतें खुलती रहेंगी और कुछ देर बाद तुम महसूस करने लगोगी कि ये गीत एक चिठ्ठी की शक्ल में तब्दील हो चुकेगा कुछ इस तरह कि लिखा गया हर शब्द लयबद्ध तुम्हारी आँखों के आगे थिरकने लगेगा। यह एक मात्र लैटर होगा जो जीवंत हो उठेगा, जिसमे संगीत भी होगा, गायकी भी, जिसमे भाव, सम्वेदना का उदगार होगा। तुम्हारी आँखें छलकें ना सही अगर मुंद भी गयी तो समझना कि किसी ने इसे चरम तक महसूसा होगा।
तुम्हें पता है तुम्हारा तसव्वुर मुझे ज़मीनी नहीं रखता, मैं बड़ा मामूली सा आदमी हूँ जो खुद को कई मुगलतों में रखे हुए है.. मैंने कला को चुना और प्रेम से बाध्य हुआ... और सच कहूँ तो इन दोनों की ही व्यापकता का विस्तार नहीं ढूंढ पाया हूँ आजतक ठीक उस तरह जिस तरह नहीं ढूंढ पाया हूँ आजतक चरम उस अलौकिक स्पर्श का जब तुम्हारी निर्मल देह को मेरी आँखों ने नेह की गहराईओं से छुआ था...
तुम जब सामने होती हो तो नदी सी बहती जाती हो, तुम्हारे वो एक्सप्रेशंस, वो आँखों व होंठों को ओवर ड्रेमटाइज़ रुख देते हुए रैपिड लगते हैं मुझे, कि जितने रैपिड आते हैं मैं उतने ही उद्वेगों से भर उठता हूँ.. तुमने सुन रखा होगा कि हर रैपिड के साथ ही राफ्ट की थ्रिल और बढ़ती जाती है..
दुनिया की कितनी भी कहानियां क्यों न हों कितने गीत सब में एक बात कॉमन मिलेगी, चाहे कर्ट कोबैन हो या कोल्ड प्ले, जेम्स, जॉर्ज या ज़ैप्लीन या चार्ली, क्लूनी या फिर पियूष, साहिर या गुलज़ार इतना भी आसान नहीं रहा होगा गुलज़ार हो जाना। सफर लम्बा रहा होगा, तमाम पथरीली राहों पर भटक कर धूल खाती ये बेढ़ब नज़रें जब तुम पर ठहरी होंगी तो एक बार फिर रंगों से भर गयी होंगी। इन सभी के फन की एक और कॉमन बात होगी कि इन सभी ने ज़रूर तुमसे ही प्रेम किया होगा कि दुनिया की हर "तुम" किसी न किसी वीराने में गुलिस्तां ईजाद करती रही हो कि तमाम चितेरों के रंगों से ये महक यूँ ही नहीं आती......
सुनो कभी अगर मौका मिले और पहाड़ों पर हो तो महसूस करना आसपास की घाटियों में साँझ की आड़ में कई इंतज़ार सिम सिम कर बल रहे होते हैं और हवाएं अपनी पेशानी पर हाथ रखे नंगे पाँव ही निकल पड़ती हैं "हम ही" में की राह में.... और वे जब मिलते हैं ना वहां से सभी राहें गुम हो जाती हैं।
दरअसल प्रेम कुछ बदलता नहीं है बल्कि यह बने रहने की हिम्मत देता है.. रस्ते रूखे सही पर सूखे पत्तों से वीरान नहीं लगते। उनमे राहगीरों के कदमों की आहटें उम्मीद की शक्ल में सरसराहट पैदा करती हैं... और फिर पियूष कहते हैं ना " आँगन में बिखरे पड़े होंगे पत्ते, सूखे से नाज़ुक से पीले छिटक के, पाँवों को नंगा जो करके चलेंगे, चरपर की आवाज़ से वो बजेंगे"
सुनो ठीक उस तरह जैसे लौटना होता है ना दूर निकल जाने के बाद भी मवेशियों को चरवाहे तक, जिस प्रकार थक कर ऊब चुकी पगडंडियां घर की बखलियों पर पहुँच कर ही आह भरती हैं... ठीक उस ही तरह मुझे मेरा घर महसूस होता है तुम तक पहुंचना।
तुम्हारी किवाड़ों सी खुली बाहें वो आरामकुर्सी लगती हैं जहाँ तमाम उलझनों, थकावटों, व्यथाओं की केचुल उतार कर मैं इत्मीनान से सुस्ता सकता हूँ...और जब कभी भी अस्तित्व की भारी जद्दोजहद से उकता कर पहुँचता हूँ तुम तक तो अपने आप ही सभी उत्तर पा लेता हूँ..
"दुनिया बस यहीं तक खूबसूरत है कि तुम हो वरना कभी झाँख कर देखना झरोके से कि खाली सडकों पर चलती हुई वो बस कितनी अकेली है कि देखना दूर तक फैली उन वादियों में कितनी उदासी पसरी हुई है.."

Friday, September 25, 2015

"पहाड़"



वे अपने घरों की बाखलियों से एक टक
पहाड़ों के उस पार दूर से देखा करते थे शहरों को
रात के अन्यारे में वाहनों की हैड लाइट
और आकाश के तारों के मध्य कहीं चमकते थे उनके स्वप्न।

पुरखों द्वारा बनाये मंदिरों में दिन रात का मंत्रोचारण था
उनके हाथ "नमस्कार" में व सिर श्रद्धा में झुके रहते थे..
वहां आस-पास एक विचित्र शान्ति भरी थी
हर ओर से देवदारों की निगरानी में
उनके निवास सुरक्षित थे,
उनके दरवाज़ों ने ताले नहीं देखे थे...

उनके मनीऑडरों में भी हालाँकि कभी तीन रकमें नहीं देखी गयीं
फिर भी जुन्याई(चांदनी) रातों में
उनकी मुरली की धुनें दूसरे गावों तक सुनाई पड़ती..

करीबियों के चेहरे राशनकार्डों पर लगभग धुँधले पड़ चुके थे
परन्तु उनके घरों में दीप सदा प्रज्वलित रहे...
टेलीग्रामों पर उतरे शब्दों की स्याही अक्सर फैली होती
पर फिर उन्होंने खेतों में उम्मीदें गोढ़ी थीं..

जबकि उनके वहां आगंतुकों का आना एक गंभीर बात थी,
उनके चूल्हों ने अस्वीकार में कभी खांसी नहीं की...

उनके पटांगणों में एक ओखल थी, एक घास का लुट,
कुछ टूटे खिलौने, चार लकड़ियाँ, फुकनी,
एक लदी मातृ देह और दो घुटनों पे सरकती हसरतें ..

उनके मासूम पदचिन्ह
अब भी अमिट हैं वहां की पगडंडियों पर...
हिमाला जिन्हें वे गिना करते थे अक्सर खेलों में
जबकि उनके माथे पर दिखने लगी हैं लकीरें,
हैं, खड़े हैं, झुके नहीं हैं तलक दिन..

गाय बकरियों भेड़ों के श्वासों के साथ-साथ
उनके स्वर गूंजते हैं ढलानों पर आज भी,
जुगनू जिनके पीछे वे भागा करते थे
आज उनकी आँखों में नज़र आते हैं...

वे कद काठी से कमज़ोर हैं और दिखने में सामान्य
परन्तु आज भी साक्षात्कारों में उनके परिचय हैं
"पहाड़" !

"आलां"


"इस बार की छुट्टी बहुत भारी लगी, वक़्त की रफ़्तार प्लेन में बैठ कर पता नहीं चलती, वक़्त को आगे पीछे रिवाइंड करने से पता चलता है कितना कुछ कितने थोड़े से वक़्त में बाकी रह जाता है" आरिफ मियां एक सुस्त जहाज़ में बैठे अपने खालीपन को विहस्की के घूँट साथ टटोल रहे हैं.... ये खालीपन यूँ ही नहीं आता, जो हमेशा से ही अकेला हो वो कभी अकेला नहीं होता, अकेलापन महसूस करने के लिए पहले पूरी इंटेंसिटी से किसी के साथ को जिया जाना ज़रूरी है.. देयर इज़ ए ह्यूज डिफरेंस बिटवीन बीइंग अलोन एंड लेफ्ट लोनली।

खालीपन असल में कभी खाली नहीं होता वह एक मर्तबान होता है, महकती यादों से भरा हुआ, किसी के साथ बिताये कुछ ज़िंदा पलों को कभी आपने बड़े चाव से चखा होता है व जिनकी लजीज़ी आपके स्वाद में अब भी बरक़रार होती है और जिस लज़्ज़त को आप अब उसकी महक से महसूस करते हैं... बिछड़ने को डार्क रोमांस का नाम दिया गया है, प्रेम के उस पल में जहाँ आप बहुत दूर हैं फिर भी आधे आधे एक दूसरे पास छूटे हुए हैं... प्रेम वाकई एक नैसर्गिक चीज़ है, एक कोमल पंख जिसे सहेज के हम अपनी सबसे पसंदीदा किताब के बीच महफूज़ कर लेते हैं, एक खाली एनवलप जो कुछ कच्ची पक्की इबारतें रख भर देने से से अपना अस्तित्व प्राप्त करता है या फिर पुरानी "तस्वीरें" जिन पर उन पलों के तमाम रंग कैद होते हैं और जो गर्द हटाते ही फिर से एक एक करके हमारी नज़रों के सामने एक मोशन की तरह चलने लगते हैं.. खैर आरिफ मियां अपना एक बहुत बड़ा हिस्सा आलां को सौंप आये हैं... इस बार की यात्रा में एक बेचैनी है... पहली बार वापसी खटकती हुई महसूस हो रही है और उनकी नज़र रह रह के तस्वीर से झांकती आलां पर जा कर ठहरती है... आलां बला की खूबसूरत है.. आलां की सबसे ख़ास बात ये है कि वो स्त्री है, एक पूर्ण स्त्री। स्त्रीत्व को केवल चरम से ही परिभाषित किया जा सकता है... एक स्त्री तमाम भावों को अपने अंदर एक ग्लेशियर की तरह जमाये रखती है.. जब तक कि किसी सुखद स्पर्श का ताप दिल को न छुए व वे सभी भाव उस जादुई लम्स से धीरे धीरे रिसने न लगें।
और अक्सर वह आंच हम तक पहुँचती है, आरिफ मियां की हथेलियाँ नरम हैं वे एक पल में ही आलां के हृदय पर की बरसों पुरानी ठिठुरन को एक विचित्र ऊष्मा से भर देती हैं और आलां एक दो मुलाक़ातों में ही पिघलने लगती है.. एक अरसे से थकी हुई वह देह टूट कर आरिफ मियां की बाहों में इस तरह गिर जाना चाहती है जैसे वे कोई सदियों पुराना भरोसेमंद दरख़्त हो और जिसके तले अल्लाहताला ने आलां के सुकून की सेज बिछाई हो...लेकिन इस जुड़ाव की ख़ास बात सीमायें हैं.. दोनों सतर्कता से अपनी अपनी रेखाओं को संभाले हुए हैं.. इन्होने प्रेम की सूक्ष्मता को समझा व अपने अपने दयारों में रह कर इसे रजामंद किया।

और इस तरह यह दो तरफ़ा कहानी है, आरिफ मियां भी आलां के प्रभाव में कुछ इस ही तरह कैद हैं कि अब उनके कैमरे को कोई और सूरत राज़ नहीं आती, आलां की चक्की से पैदा होती वो रगड़ उसके दिल की कसमसाहट बन गयी है, आलां के बुक को होंठों से छूते ही वह प्यास अब जीवन भर के लिए तृप्त हो गयी और वे बड़ी बड़ी आँखें जिन्हें वे तस्वीरों पर छुए जा रहे हैं जैसे दो चिराग हों जिनसे उनकी राहें जगमगाने लगी हैं.. सब कुछ अपने आप सुलझ गया है.. मानो वह लम्बी तलाश एक पल में ही पूरी हो गयी हो और आरिफ की रूह अपने मकाम पर खड़ी मुस्कुराने लगी हो... लेकिन कुछ चीज़ें समझते देर हो जाती है, नज़दीकियां कितनी हो चुकी अक्सर फासलों से समझी जाती हैं...
छुट्टियां अब पूरी हो चुकीं। आज आरिफ मियां को निकलना है.. वे आलां के आँगन में खड़े उससे रुखसत अर्ज़ कर रहे हैं... आलां उफान पर है... वह कुछ इस तरह आरिफ मियां को देख रही है जैसे कितना कुछ बकाया है जो उन्हें उसे अदा करना है, जैसे वह अपना हक़ जानना चाहती है और फिर अचानक वह सैलाब जो उसने पहले दिन से अपने सीने में दबा के रखा है यकायक ही उसकी आँखों से फूट पड़ता है.. वह सफ़ेद कुरता जो आरिफ मियां आज पहने बैठे हैं वह आलां ने सिया था... आलां एक स्त्री है, पूर्ण स्त्री वह अपने चरम पर बहती हुई नदी है.. वह कई कई हाथों की अकेली कारीगर है, उसने खुद को सौंप कर प्रेम को चुना है...
आरिफ मियां खिड़की से बाहर झाँक कर एक लम्बी आह भरते हैं और आँखें मूँद लेते हैं...